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प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस, जिन्होंने आंकड़ों से बनाई विकास की राह

प्रोफेसर प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस ने अपने कार्यों से देश की विकास संबंधी नीतियों के निर्माण में सर्वे की उपयोगिता से लोगों का परिचय कराया।

 
By Navneet Kumar Gupta
Last Updated: Tuesday 03 July 2018

15 दिसंबर 1953 को भारतीय सांख्यकी संस्थान में प्रधानमंत्री नेहरू के साथ महालनोबिस। स्रोत: भारतीय सांख्यकी संस्थानअखबारों में हम विभिन्न विषयों पर किए गए सर्वेक्षणों पर आधारित खबरें अक्सर पढ़ते रहते हैं। एक समय ऐसा भी था, जब भारत में सर्वे संबंधी कार्यों और उसके महत्व के बारे में देश के बहुसंख्य लोग परिचित नहीं थे। उस दौर में प्रोफेसर प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस ने अपने कार्यों से देश की विकास संबंधी नीतियों के निर्माण में सर्वे की उपयोगिता से लोगों का परिचय कराया।

प्रोफेसर प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस को उनके द्वारा विकसित ‘सैंपल सर्वे' के लिए याद किया जाता है। इस विधि के अंतर्गत किसी बड़े जनसमूह से लिए गए नमूने सर्वेक्षण में शामिल किए जाते हैं और फिर उससे मिले निष्कर्षों के आधार पर विस्तृत योजनाएं बनाई जाती हैं। महालनोबिस ने इस विधि का विकास एक निश्चित भूभाग पर होने वाली जूट की फसल के आंकड़ों से करते हुए बताया कि किस प्रकार उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है।

सांख्यिकी के क्षेत्र में महालनोबिस ने कुछ ऐसी तकनीकों का विकास किया, जो आगे चलकर सांख्यिकी का अभिन्न हिस्सा बन गईं। महालनोबिस की प्रसिद्धि का एक ओर कारण महालनोबिस दूरी भी है, जो उनके द्वारा सुझाई गई एक सांख्यिकीय माप है। प्रोफेसर महालनोबिस देश में आर्थिक नियोजन के निर्माता और व्यावहारिक सांख्यिकी के अगुआ रहने के साथ ही एक दूरद्रष्टा भी थे। उन्होंने दुनिया को बताया कि कैसे सांख्यिकी का प्रयोग आम जनता की भलाई के लिए किया जा सकता है।

आर्थिक योजना और सांख्यिकी विकास के क्षेत्र में प्रशांत चन्द्र महालनोबिस के उल्लेखनीय योगदान के सम्मान में भारत सरकार द्वारा उनके जन्मदिन यानी 29 जून को हर वर्ष 'सांख्यिकी दिवस' के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक नियोजन और नीति निर्धारण में प्रोफेसर महालनोबिस के कार्यों से जनमानस को प्रेरित करना है।

महालनोबिस का जन्म 29 जून, 1893 को कोलकाता में हुआ था। उन्होंने कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से भौतिकी विषय में ऑनर्स किया और स्नातक के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए लंदन चले गए। वहां उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से भौतिकी और गणित दोनों विषयों से डिग्री हासिल की। भौतिकी में उन्हें पहला स्थान मिला। कैम्ब्रिज में उन्होंने महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन से भी मुलाकात की। महालनोबिस ने कैवेंडिश लेबोरेटरी में प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी और मौसम विज्ञानी सी.टी.आर.विल्सन के साथ भी कार्य किया। उसके बाद वह कोलकाता लौट आए।

आर्थिक योजना व सांख्यिकी विकास के क्षेत्र में महालनोबिस का उल्लेखनीय योगदान रहा है। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें स्वतंत्रता के बाद नवगठित केंद्रीय मंत्रिमंडल का सांख्यिकी सलाहकार भी नियुक्त किया था। सरकार ने महालनोबिस के विचारों का उपयोग करके कृषि और बाढ़ नियंत्रण के क्षेत्र में कई अभिनव प्रयोग किए। उनके द्वारा सुझाए गए बाढ़ नियंत्रण के उपायों पर अमल करते हुए सरकार को इस दिशा में अप्रत्याशित सफलता मिली। स्वतंत्र भारत में औद्योगिक उत्पादन की बढ़ोतरी तथा बेरोजगारी दूर करने के प्रयासों को सफल बनाने के लिए महालनोबिस ने ही योजना तैयार की थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाने के उद्देश्य के लिए वर्ष 1949 में महालनोबिस की अध्यक्षता में ही एक ‘राष्ट्रीय आय समिति’ का गठन किया गया था। जब आर्थिक विकास को गति देने के लिए योजना आयोग का गठन किया गया तो उन्हें इसका सदस्य बनाया गया। प्रोफेसर महालनोबिस चाहते थे कि सांख्यिकी का उपयोग देश हित में हो। महालनोबिस ने देश को आंकड़ा संग्रहण की जानकारी दी। पंचवर्षीय योजनाओं के निर्माण में उनका अहम योगदान रहा है। भारत सरकार की दूसरी पंचवर्षीय योजना का मसौदा तैयार करने में उन्होंने अपनी अहम भूमिका निभाई।

17 दिसंबर, 1931 को प्रोफेसर प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस ने कोलकाता में ‘भारतीय सांख्यिकी संस्थान’ की स्थापना की। आज कोलकाता के अलावा इस संस्थान की शाखाएं दिल्ली, बंगलूरु, हैदराबाद, पुणे, कोयंबटूर, चेन्नई, गिरिडीह सहित देश के दस स्थानों में हैं। संस्थान का मुख्यालय कोलकाता है, जहां मुख्य रूप से सांख्यिकी की पढ़ाई होती है। वर्ष 1931 से मृत्यु तक वह भारतीय सांख्यिकी संस्थान के निदेशक और सचिव बने रहे। संसद ने वर्ष 1959 में एक अधिनियम पारित करके भारतीय सांख्यिकी संस्थान को ‘राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया। प्रोफेसर महालनोबिस को वर्ष 1957 में अंतरराष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान का सम्मानित अध्यक्ष बनाया गया।

प्रोफेसर प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। एक वैज्ञानिक होने के साथ ही साहित्य में भी उनकी रुचि थी। उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर की कृतियों पर अनेक लेख लिखे थे। शांति-निकेतन में रहकर महालनोबिस ने टैगोर के साथ दो महीने का समय बिताया। इस दौरान टैगोर ने उन्हें आश्रमिका संघ का सदस्य बना दिया। बाद में जब टैगोर ने ‘विश्व भारती’ की स्थापना की तो प्रोफेसर महालनोबिस को संस्थान का सचिव भी नियुक्त किया। महालनोबिस ने गुरुदेव के साथ कई देशों की यात्राएं भी की और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज भी लिखे। वास्तुकला में भी उनकी रुचि थी।

अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित महालनोबिस वर्ष 1945 में रॉयल सोसाइटी, लंदन के ‘फेलो’ भी चुने गए। भारत सरकार ने भी उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। 28 जून, 1972 को प्रो. प्रशांत चंद्र महालनोबिस का निधन हो गया। 

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